Instagramzan Mubarak

Writing in Hindi after a long time – class 10th Hindi Board exams to be precise. Jittery, but happy. I hope it connects. So, this is the story of an evening at Jama Masjid…

Jama Masjid 2
Photo: Aaqib Raza Khan

कहते हैं की तस्वीरें बोलती हैं | शायद एक तस्वीर हज़ार के बराबर हो जाती हैं | ज़रूरी भी है की वो बोलें, भला अभिव्यक्ति की अाज़ादी की लड़ाई में तस्वीरें क्यूँ चुप रहें भला? लेकिन अफसोस तब होता है जब सिर्फ तस्वीरें ही बोलती हैं और तस्वीर में छुपे किरदार की कहानी तस्वीर के चार दीवारी में hashtag के सहारे कहीं और टांग दी जाती हैं | इसी रमज़ान, इन्ही तस्वीरों में मैने कई बार जामा मस्जिद को , कई बार ज़ाकिर नगर को और कई बार पकौड़ियों, चिकेन , मटन और तरह तरह की चीज़ें तरह तरह के hashtag के साथ देखीं | काफी एक्साइटिंग लगा ये त्योहार | मेरे रोज़ के शरबत और टोस्ट से ज़्यादा महंगा त्योहार | यही सोचके पिछले संडे को मैं जामा मस्जिद गया क्यूंकि रमज़ान का ‘फील’ वहीं अाता हैं | दिल्ली में 24 साल गुज़ारने के बाद पहली बार जामा मस्जिद पे इफ़्तार करने वाला था | भाई वाह |

Jama Masjid 3
Photo: Aaqib Raza Khan

जामा मस्जिद में काफी भीड़ थी | सबने अपने हिस्से की ज़मीन पर चादर डाल ली थी और चलने भर की जगह भी नहीं | यह तस्वीरों जैसा क्यों नहीं लग रहा , मैने सोचा | कई लोग कैमरा टांगे भटक रहे थे | कभी किसी बच्चे की शकल पी ज़ूम, कभी नक़ाब के पीछे छुपे चेहरे को अपने कैमरे में क़ैद करने की होर्ड और कहीं दाढ़ी वाले मौलवी की साथ में तस्वीर | बैकग्राउंड में जामा मस्जिद खूब जम रहा था शायद, वरना उन तस्वीरों में ऐसा कुछ भी अलग नहीं था | रमज़ान के hashtag के साथ शायद अच्छा लगता हो |

इफ़्तार के बाद सब होटलों पर लाइन लग गयी| हमको भी अल-जवाहर के चिकेन जहांगीरी के लिए 10 मिनट लाइन में लगना पड़ा | वो अलग बात है घर पी कभी मां को 10 मिनट भी खाना देने में देर नहीं होने दिया हमने … पर ‘फील’ की बात थी तो इंतज़ार किया | खाना खाते में 10 बज गए रात के, लेकिन भीड़ देख के लगा की शायद मेरी घड़ी का धोका है |

वहां से निकले बस रास्ते भर सोचता रहा – की वो हज़ारों लोग ‘रमज़ान’ मना रहे थे या ‘रमादान’ मन रहे थे? क्यूंकि हर साल इस मामले को बड़ी इंटरेस्ट के साथ अखबारों में, सोशल मीडिया पे डिस्कस किया जाता है बिना किसी हल के | वो सोशल मीडिया और अखबार जो बस जामा मस्जिद पे जा कर उन्हीं खामोश तस्वीरों को खींच लेते हैं | कहानियाँ अनकही रह जाती हैं, रमज़ान की|

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